मजदूरों के मुद्दे! चुनावी मुद्दे क्यों नहीं बनते - शैतान रेगर

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 13-MAR-2024 || अजमेर || भारत में लोकतंत्र को 74 वर्ष पूरे हो गए हैं व आजादी का अमृत काल चल रहा हो फिर भी यह लोकतंत्र अधूरा सा लगता है क्योंकि लोकतंत्र के इस पार्टी तंत्र ने देश के एक बड़े हिस्से को एक दम से भूला दिया गया है। देश में आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार कुल 53.53 कामगारों में से 43.99 करोड़ श्रमिक असंगठित क्षैत्र में काम करते हैं। असंगठित क्षैत्र के मजदूरों में बड़ी संख्या में मजदूर एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास करतें हैं। यह प्रवास मौसमी व कुछ क्षेत्रों में लम्बा भी होता है। जो गांव शहर राज्य को छोड़कर रोजगार की तलाश में दूसरें शहर व राज्य में परिवार सहित व पुरूष चलें जातें हैं यह मजदूर अपने वतन वापस कब , कितनें समय में आऐंगे पता नहीं। देश भौगोलिक रूप से भले ही आजाद हो गया हो लेकिन काम के कुछ क्षेत्रों में मजदूर आज भी अपना निर्णय के लिए स्वतंत्र नहीं होता है। हालांकि मजदूर के जीवन के सारे निर्णय तो मालिक ही करता हैं। लोकतंत्र में हर पांच वर्ष में देश की सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ें चुनाव लोकसभा,राज्यों के लिए विधानसभा व स्थानीय नगर निकाय व पंचायत राज के चुनाव होते हैं । लेकिन इस पंचवर्षीय चुनाव प्रणाली में पार्टी तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। चुनावों में राजनैतिक पार्टियां चुनाव जीतनें के लिए पूरी ताकत लगाती है अच्छे प्रत्यासी का चयन ,धन बल व घोषणा पत्र यह सब करती है ताकि अपने अपने दल की सरकार बना सकें। बस सभी राजनैतिक दलों से एक चूक हो जाती है और वह जब भी राजनैतिक दल 100, 50 पन्नों का चुनावी घोषणा पत्र बनानें है तब सभी दलों के घोषणा पत्र में देश की 40 प्रतिशत आबादी के लिए पांच लाइन की जगह भी नहीं मिलती है जब मजदूरों की बारी आती है तो या तो कागज कम पड़ जाता है या इनकी स्याही सूख जाती है। कुछ दल तो मात्र एक लाइन में ही खत्म कर देते है। सबसे बड़ा सवाल है कि आखिरकार देश की इतनी बड़ी आबादी को राजनैतिक दल क्यों बिसरा देतें है। क्यों इनके घोषणा पत्र मजदूरों के मुद्दे पर सूने हो जाते हैं। इसके क्या कारण है कि एक किताब जैसे घोषणा पत्र में थोड़ी भी जगह मजदूरों के लिए क्यों नहीं रख पाते हैं ऐसी क्या मजबूरी है क्या इसके लिए पूंजीवादी ,ब्राह्मणवादी व्यवस्था के वाहक इसकी इजाजत नहीं देते या मजदूर लोकतंत्र व राजनैतिक दलों के लिए मजदूर कोई खास हैसियत नहीं रखतें या मजदूरों के कोई मुद्दे! मुद्दे ही नहीं है । हाल ही में हमनें कोविड जैसी महामारी में मजदूरों के हालात पूरे देश ने देखें है कैसे पूंजी पतियों ने सभी मजदूरों को सड़क पर मरनें के लिए छोड़ दिया था व खुद को अपने महल में स्वंय व अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए दरवाज़ें बंद कर लिए थे। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,स्थानीय रोजगार ,शोषण,न्यूनतम मजदूरी,बंधुआ मजदूरी, मौलिक अधिकार व श्रम कानूनों की पालना जैसे सैकड़ों मुद्दे आज भी मुंह बाहें खडे़ है लेकिन जब मजदूरों की बात आती है तो सबके सब क्यों चूपी साध लेते हैं। सब वर्गों के मुद्दों पर बात होती है चुनावी मुद्दे भी बनते हैं सिर्फ मजदूरों पर ही बात क्यों नहीं होती है। क्या? सबके वोट का मूल्य अलग- अलग है! देश के संविधान निर्माताओं ने तो इस देश के नागरिकों को प्रत्येक नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया था गरीब हो चाहें अमीर सबके वोट की कीमत बराबर होगी जब वोट की कीमत समान है तो बाकी मतदाताओं के हित व कल्याण के मुद्दों पर बात होती है राजनैतिक दल घोषणा पत्र में भी लम्बा चौड़ा लिखतें है चुनावों में चर्चा भी होती है तो सिर्फ मजदूरों के मुद्दों पर ही बेरूखी क्यों। असंगठित क्षैत्र के प्रवासी मजदूर जो स्थानीय स्तर पर काम नहीं मिलनें से एक जिले से दुसरे जिलें में व एक राज्य से दुसरे राज्य में काम की तलाश में चले जाते हैं। इन मजदूरों को वापस अपने घर आनें में महीनों सालों लग जाते हैं कहीं बार तो यह मजदूर अपने मताधिकार का उपयोग भी नहीं कर पाते हैं कई बार मजदूर अपने मताधिकार का उपयोग करना चाहता भी है लेकिन वह अपनें गांव व राज्य में जानें के लिए स्वतंत्र नहीं होता है। बहुत से क्षैत्र ऐसे है जिनमें मालिक मालिक वोट डालनें के लिए भी छुट्टी नहीं देता है भलें ही मतदान दिवस पर सवैतनिक अवकाश होता है लेकिन यह अवकाश आज तक मजदूर को कभी मिला ही नहीं बहुत से कामों में तो छुट्टी ही नहीं मिलेती व कुछ में मिलती है तो मजदूरी नहीं। देश में ऐसा ही एक व्यवसाय है ईंट भट्ठा इस पूरे व्यवसाय में सीजन भर के लिए नियमित मजदूर चाहिए होते हैं इस व्यवसाय में हर रोज नया मजदूर नहीं लाया जा सकता है एवं देश में अधिकांश ईट भट्ठों पर प्रवासी मजदूर ही काम करतें हैं इन मजदूरों को जब भी चुनाव होते हैं मालिकों द्वारा घर नहीं जानें देने से भट्ठों के सभी मजदूर वोट से वंचित रह जाते हैं। इसलिए भी राजनैतिक दल व स्थानीय जनप्रतिनिधि मजदूरों व उनके मुद्दों पर कम ध्यान देते है। स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर संगठनों की मजबूत आवाज नहीं होनें से भी मजदूर व मजदूरों के मुद्दे हांशिएं पर रहें हैं। आज भी मजदूरों को दुर्दशा हम सब से छुपी नहीं है। मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी ,बच्चों की शिक्षा स्वास्थ्य ,श्रम कानूनों की पालना,सुरक्षा के उपाय, सामाजिक सुरक्षा ,सरकार की योजनाओं से वंचित इन सबसे मजदूर कोषों दूर है सबसे ज्यादा मेहनत करने के बाद भी देश सबसे ज्यादा दुर्दशा खराब है तो वह है मजदूर देश की सता व राजनैतिक दलों पर पूंजीपतियों का प्रभाव देखा जाता है इसलिए भी मजदूरों के मुद्दे हमेशा दोयम दर्जे के हो जाते हैं सबकी प्राथमिकता सिर्फ मालिक होतें है। उतर प्रदेश के चित्रकुट जिलें मजदूर सुरेश रैदास बताते हैं की में पिछलें 25 सालों से राजस्थान के ईंट भट्ठों पर काम कर रहा हूं मेनें अभी तक जीवन में 3-4 बार ही वोट डाला पाया हूं जब भी वोट पड़ते हैं तब में अक्षर काम की वजह से बाहर ही रहता हूं कभी कभी वोट पड़ते हैं तब हमारे राज्य से फोन भी आता है लेकिन सीजन के बीच में भट्ठा मालिक भी नहीं जानें देता है व बहुत दूर होनें से हमारी मजदूरी का भी नुकसान होता है व इतना किराया भाड़ा लगाकर वोट डालनें जाना भी संभव नहीं होता है क्योंकि ईंट भट्ठों पर नियमित मजदूरी नहीं मिलती है मजदूरी तो सीजन के अंत में ही मिलती है बीच में मालिक पैसा नहीं देता है और मालिक का काम भी खराब होता है। साथ ही बिहार के बांका जिलें के मंटू लैया बताते हैं की हम लोग तो गांव से आने के बाद 9-10 महीने भीलवाडा राजस्थान के ईंट भट्ठों पर काम करतें हैं कब चुनाव होते हैं पता ही नहीं चलता है । कभी कभी गांव के सरपंचों के चुनाव का पता चलता है बाकी चुनाव में तो अंतिम बार कब वोट डाला है याद ही नहीं है । मजदूरों से बात करने से पता चलता है की क्यों मजदूरों के मुद्दे चुनावी मुद्दे नहीं बनते हैं ज्यादातर मजदूर वोट ही नहीं डालते हैं बल्कि इनको वोट डालने ही जानें नहीं दिया जाता हैं इसलिए चुनावों में राजनैतिक दल व प्रत्यासी व जनप्रतिनिधि मजदूरों के मजदूरों की चर्चा ही नहीं करतें हैं। तभी हम लोग देखते हैं देश में लोकतंत्र लागू होने के इतनें वर्षों बाद भी शत प्रतिशत मतदान क्यों नहीं होता है अक्षर देखने में आता है की लोकसभा चुनाव या विधानसभा में अधिकतम 60 से 80 प्रतिशत मतदान ही हो पाता है। हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं बनती है कि देश में हर चुनाव में 100 प्रतिशत मतदान हो कोई भी नागरिक किसी भी कारण से चाहे वो अपने गांव ,शहर, राज्य से बाहर रहता हो मताधिकार से वंचित नहीं रहें। जब सभी मजदूर अपने मताधिकार का उपयोग करेगें तो निश्चित रूप से अपने मुद्दों के प्रति भी मुखर होगें तभी राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र में भी मजदूरों को जगह मिलेगी व चुनावों में भी चर्चा होगी। जब देश में एक देश एक व्यवस्था जैसी कल्पना की जा रही है तो देश का नागरिक चुनाव के समय कहीं भी मौजूद हो उसें उसी जगह पर मताधिकार का उपयोग कर सकें ऐसी व्यवस्था हो ताकि प्रवासी मजदूर भी मताधिकार का उपयोग कर सकें जिसे सरकारें , राजनैतिक दल मजदूरों के मुद्दों का अकाल खत्म कर सकें।।।।।

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