गलत परुपणा करने से संसार बढ़ता है :- गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 02-NOV-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने महावीर प्रभु की जीवन गाथा को फरमाते हुए कहा कि प्रभु का जीव नयसार के भव में था, तो उसका संत मुनिराजो के प्रति अनुपम अहोभाव था। बड़ों से कुछ प्राप्त करने के लिए उनके प्रति अहोभाव जरूर होना चाहिए। उसमे संतों के प्रति विनय का भाव था। विनयवान व्यक्ति को अगर संतों से कुछ पूछना भी होता है तो वह उनके पास जाकर दोनों हाथों को जोड़कर अपनी जिज्ञासा का समाधान करने का प्रयास करता है।और विनयवान को ही अपुर्व ज्ञान आदि के लाभ की प्राप्ति हो सकती है। संतों ने नयसार को संयम जीवन ग्रहण करने की प्रेरणा प्रदान की। मगर नयसार के असमर्थता व्यक्त करने पर घर में ही अनाशक्तिपूर्वक कर्तव्य पालन की प्रेरणा प्रदान की। नयसार ने संतों की सेवा व सत्संग से सम्यक्त्व रूपी महान लाभ को प्राप्त किया और अपने संसार परिभ्रमण को सीमित किया।वहां से आयुष्य पूर्ण कर देवलोक में गया। फिर तीसरे भव में अयोध्या नगरी में भरत महाराज के पुत्र मरीचि के रूप में जन्म लिया। वहां पर संयम जीवन को स्वीकार किया मगर संयम की कठिनाइयों से घबराकर त्रिदंडी साधु बना। वहां पर कुल का अभिमान किया,एवं अपने धर्म को सत्य कह कर गलत परुपणा करने के कारण मरीचि ने अपना अनंत संसार बढ़ा लिया। अतः अपने मन के अनुसार कभी भी गलत परुपणा नहीं करके वीतराग भगवान के द्वारा बताए गए धर्म को ही सही बताने का प्रयास करना चाहिए।क्योंकि सर्वज्ञ प्रभु की वाणी ही सत्य होती है। गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि उत्तराध्यन सूत्र के 12 वे अध्ययन का नाम हरिकेशीय है।यह हरिकेशी बल के नाम से पड़ा। वह अत्यंत कुरूप व क्रोधी स्वभाव का था।इसलिए बालक उसे अपने साथ नहीं खिलाते थे। एक बार उसने देखा जिस सांप में जहर था, उसे लोगों ने मार दिया एवं जिस सांप में जहर नहीं था,उस सांप को लोगों ने छोड़ दिया।तब उसका चिंतन चला कि मेरे में भी क्रोध रुपी जहर है, इसलिए मुझे कोई पसंद नहीं करता। चिंतन ही चिंतन में वह जाति स्मरण ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं। संयम को स्वीकार करके विशिष्ट मासखमन आदि की तपस्या से अपनी आत्मा को भावित करते हैं। उन्होंने यज्ञ शाला में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों को सच्चे यज्ञ का महत्व समझाया कि यज्ञकुंड हमारी जीवात्मा है,संयम शांति पाठ है, तप रूपी अग्नि है, जो कर्मों को जलाने का कार्य करती है, सच्चा स्नान ब्रह्मचर्य का होता है। इस अध्ययन का सार है कि कभी संतों का तिरस्कार नहीं करना और किसी को भी छोटा समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए। तेरवहा अध्ययन चित्तसंभूतिय है इसमें पांच भव में साथ रहे भाइयों का वर्णन है। जिसमें एक भाई ब्रह्मदत चक्रवर्ती बनता है और दूसरा भाई मुनिराज बनता है। दोनों एक दूसरे को भोग व योग के लिए आमंत्रित करते हैं।। चित्त मुनि ब्रह्मदत्त को संयम की उपादेयता समझाते हैं।तब वह कहता है कि आप सही फरमाते हैं मगर मेरी स्थिति कीचड़ में फसे उस हाथी के समान है, जिसको किनारा तो नजर आता है मगर वहां तक पहुंच नहीं सकता।तब एक ने भोग में कॉल किया तो नरक का मेहमान बना और चित मुनि ने संयम पालकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। अत:जिनवाणी को सुनकर हमें धर्म मार्ग में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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