संतों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए :- गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 04-NOV-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि हम बहुत भाग्यशाली और सौभाग्यशाली है, जो हमें उत्तराध्यन सूत्र और महावीर कथा को सुनने का अवसर प्राप्त हो रहा है। हमने सुना की 16 वे भव में भगवान का जीव विश्वभूति कुमार के रूप में था। संसार की स्वार्थमय स्थितियों को समझ कर उन्होने संयम जीवन को स्वीकार कर लिया। मास मासखमन की उग्र तपस्या के कारण उनका शरीर कृष काय हो गया। कुमार विशाखनंदी के द्वारा उनकी मजाक उड़ाने पर, उनकी कसाय की ज्वाला भड़क उठी और उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली कि तुम मुझे दुख देते हो तो भविष्य में मैं भी तुम्हें दुख देने वाला बनूंगा।और इस निदान की आलोचना किए वगैर ही काल धर्म को प्राप्त हो गए। एक बाहरी निमित्त को पाकर मुनि अपनी साधना से विचलित हो गए। याद रखें निमित्त किसी भी रूप में सामने आ सकते हैं। यही तो साधक की परीक्षा का अवसर होता है।और साधक का लक्ष्य इन बाधाओ पर विजय प्राप्त करने का होना चाहिए। गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने उत्तराध्यन सूत्र का विवेचन करते हुए फरमाया कि 16 वे अध्ययन का नाम है ब्रह्मचार्य समाधि। ब्रह्मचर्य को जितने भी व्रत है उनमें प्रधान माना गया है ।इसे तपों में सर्वश्रेष्ठ तप कहा गया है। साधु के लिए ब्रह्मचर्य की नवबाड़ बताते हुए कहा कि साधु को स्त्री, पशु व नपुंसक से सहित स्थान में नहीं रहना चाहिए।स्त्री संबंधी कथा व वार्ता नहीं करनी चाहिए। जिस स्थान पर स्त्री बैठी हो तो लगभग 24 मिनट तक उस स्थान पर नहीं बैठना चाहिए।स्त्री के अंगों पांगो को नजर भर भर कर नहीं निखारना।स्त्री के गीत हास्य रुदन आदि शब्दों को नहीं सुनना ।पूर्व के भोगे हुए भोगों का स्मरण नहीं करना। प्रतिदिन सरस व स्वादिष्ठ आहार का सेवन नहीं करना। रुखा, सुखा आहार भी अधिक मात्रा में ठूस ठूस कर नहीं खाना।शरीर का श्रृंगार व विभुषा आदि नहीं करना।इसी के साथ एक कोट यानी परकोटा दिया कि शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि में आसक्त नहीं होना।जो इस दुष्कर ब्रह्मचर्य व्रत को स्वीकार करते हैं, उन्हें देव,दानव, यक्ष, राक्षस आदि सभी नमस्कार करते हैं ।इस धर्म को अपनाकर साधक संसार समुद्र से पार पहुंच जाते हैं। सतरवे अध्ययन पापश्रमनिय।किन-किन कार्यों के द्वारा साधक अपने संयम जीवन को दूषित करता है। और पाप में प्रवृत्ति करता है। गुरु की निंदा व अवर्णवाद करने वाला। गुरु के सामने बोलने वाला। खा पीकर सोते रहने वाला। प्रतिलेखना में प्रमाद करने वाला।शांत विवाद को पुन:जागृत करने वाला। सुबह से शाम तक खाते पीते ही रहने वाला। ऐसे दोष वाला साधु लोक में निंदा का पात्र बनता हैं।इस भव व परभव दोनों को बिगाड़ता है। 18 वे अध्याय में संयंतीय है। इस अध्ययन में शिकार खेलने वाले शौकीन राजा को गर्दमाली अनगार जीव हिंसा से मुक्त होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।सभी जीवो को अभय दान देने की प्रेरणा देते हैं। जिसे समझकर संजय राजा 6 काया के जीवो की हिंसा का त्याग कर,संयम जीवन को स्वीकार कर लेता है।क्षत्रिय मुनि से चर्चा में उनसे भरत आदि चक्रवर्तियों के 6 खंड के त्याग और संयम ग्रहण का वर्णन सुनकर संयम में स्थिरता और दृढ़ता को प्राप्त कर अपनी आत्मा का कल्याण करता है। हमें भी इन प्रसंगों को सुनकर अपनी आत्मा का कल्याण करना है, तभी यह सुनना सार्थक सिद्ध हो सकेगा। सूत्र का मूल वाचन पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने किया। धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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