उत्तम विधिपूर्वक कार्य करने वाला ही सुविधिनाथ होता है --- गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 23-SEP-2023 || अजमेर || गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि 24 तीर्थंकर भगवान में नवे भगवान का नाम सुविधिनाथ है। इनका नाम सुविधिनाथ रखा गया, क्योंकि गर्भ के प्रभाव से इनकी मां हर कार्य को विधिपूर्वक करने लग गई ।इनका दूसरा नाम पुष्पदंत भी है क्योंकि इनकी मां को पुष्प का दोहद उत्पन्न हुआ था। पूर्व में महापदम राजा के भव में संयम जीवन स्वीकार करके इन्होंने बड़ी तपस्या को स्वीकार कर भावों के निर्मलता से तीर्थंकर पर्याय का बंद किया। जिसके फल स्वरुप यह तीर्थंकर बने। इनका चिन्ह है मगरमच्छ। मगर का चिन्ह हमें प्यारी सी प्रेरणा देता है कि जिस प्रकार में पानी में रहकर भी पानी में डूबता नहीं इस प्रकार तुम भी संसार में रहकर संसार समुद्र में मत डूबना। हलुकर्मी जीव संसार सागर से तिर जाता है और भारीकर्मा जीव संसार सागर में डूब जाता है। अत: अपने आप को कर्मों से हल्का करने का प्रयास करें। दूसरी प्रेरणा है कि मेरी तरह बदनाम मत होना कि अमुक व्यक्ति मगरमच्छ के आंसू बहा रहा है ।यानी दिखावटी जीवन मत जीना ।अंदर और बाहर से एकरूपता का जीवन जीने का प्रयास करना ।यानी अपनी कथनी और करनी में एक समानता रखना। इसी के साथ मगरमच्छ कहता है कि जिस प्रकार मेरे जबड़े से बचना मुश्किल है, उसी प्रकार व्यक्ति का मृत्यु से बचना मुश्किल है ।व्यक्ति लाख कोशिश ही क्यों न कर ले ,पर्वत पर चढ़ जाए ,गुफा में छिप जाए या समुद्र की तलहटी में क्यों ना चला जाए वह मृत्यु से बच नहीं पता है। जिसने जन्म को धारण किया है उसे एक ने एक दिन मरना ही पड़ता है ।मृत्यु ने तीर्थंकर ,चक्रवर्ती ,बलदेव, वासुदेव या राजा महाराजाओं को भी नहीं छोड़ा है ।अतः अपनी मृत्यु को ध्यान में रखते हुए जिस कार्य के लिए यह मानव जन्म मिला यानी धर्म ध्यान त्याग तपस्या संयम साधना से अपनी आत्मा को ज्यादा से ज्यादा जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। तो भगवान सुविधि नाथ और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उनके चिन्ह की विशेषताओं को सुनकर हम हमारे जीवन को धर्म मार्ग में आगे बढ़ाएंगे तो सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा । आज की धर्म सभा में श्रीमती शिल्पा जी खटोड़ ने 13 उपवास श्री संपत राज जी पोखरना ने 8 उपवास की तपस्या के प्रत्याखान ग्रहण किया। गुरुदेव द्वारा विविध कार्यक्रमों में सभी को पूर्ण उत्साह एवं समर्पण भाव के साथ सहयोग की प्रेरणा प्रदान की। धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया । धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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