इन्द्रियों का संयम ही आगे बढ़ने मे सहायक :-- गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 27-SEP-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि तुम अगर ब्रह्मचार्य व्रत में आगे बढ़ना चाहते हो तो अपने पर अपना कंट्रोल करते हुए जीवन जीने का प्रयास करो ।जैसे गाड़ी चलाते समय ड्राइवर केवल एक्सीलेटर पर ही पैर लगाते हुए चले और ब्रेक नही दबाए तो एक्सीडेंट होने की संभावना रहती है ।एक कुशल ड्राइवर को ब्रेक व एक्सीलेटर का संतुलन रखते हुए गाड़ी चलाना होता है। उसी प्रकार व्यक्ति को भी जीवन रूपी गाड़ी चलाते समय अपने आप का नियंत्रण हर समय रखना चाहिए। एक प्रश्न है कि क्या इंद्रिय आंख, नाक,कान आदि दोषी है या नहीं ?नहीं। क्योंकि इनको चलाने वाला मन है, तो मन पर लगाम लगाना जरूरी है । तीसरी इंद्रीय है घानेंद्रीय ,इसका संयम घानेंद्रीय संयम कहलाता है। ब्रह्मचर्य की नव बाढ़ में बताया गया है की ब्रह्मचारी पुरुष शरीर की विभूषा , सजावट आदि न करें ।शरीर पर इत्र,सेंट आदि लगाने से काम भाव बढ़ने की संभावना रहती है। सांप को पकड़ने वाले सुगंधित पदार्थ रखकर छोड़ देते हैं, उससे आकर्षित होकर सांप आ जाते हैं और फिर पकड़ लिए जाते हैं ।एक-एक इंद्रिय का है असंयम भी पतन का कारण बन सकता है । चौथी इंद्रिय है रसनाइंद्रिय, इसका संयम बड़ा आवश्यक है।आहार का भी ब्रह्मचार्य पर असर आता है।हमारे यहां पर तीन प्रकार के आहार बताए गए हैं । पहला आहार है तामसी आहार जो शरीर में उत्तेजना व तेजी को बढ़ाता है।हमारे यहां पर जमीकंद के निषेद का एक कारण यह भी है। दूसरा राजसी आहार, अत्यधिक गरिष्ठ पदार्थों के सेवन के पश्चात इंद्रियों एवम मन पर कंट्रोल कर पाना आसान नहीं होता है। अत: राजसी आहार का भी ब्रह्मचारी के लिए निषेध है। तीसरा आहार है सात्विक आहार,जिसे ब्रह्माचारी व्यक्ति अपने संयम जीवन जीने व सेवा आदि कार्यों में प्रवृत्त रहने के लिए ग्रहण कर सकता है। आहार के प्रति आकर्षण का भाव व्यक्ति को संयम,तप व साधना से भी नीचे गिरा सकता है। इसलिए भगवान ने हरपल साधक को सावधान व सचेत रहते हुए घानेनेंद्रिय व रसनाइन्द्रिय के संयम को रखने की पावन प्रेरणा प्रदान की है। अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ हमारा रह पाया तो हमारा यह जिनवाणी को सुन पाना सार्थक हो सकेगा। 28 सितंबर को भिक्षु दया एवम चौमुखी पंचासन भक्तांमर के प्रसंग में ज्यादा से ज्यादा भाग लेने की गुरुदेव द्वारा प्रेरणा प्रदान की गई। धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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