पाप में फंसी आत्मा का बाहर निकलना मुश्किल -- गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 04-AUG-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया की आपने कभी चिंतन किया या नहीं ,कि भगवान आपको पाप छोड़ने पर जोर क्यो देते हैं ?क्योंकि करुणासागर भगवान को यह मालूम है कि एक बार जब आत्मा पाप के चंगुल में फस जाती है तो फिर उसका बाहर निकल पाना बड़ा मुश्किल होता है ।अतः समझदारी इसी में है इसके स्वरूप को समझकर इससे बचने का का प्रयास करें ।वचन बलप्राण हिंसा कैसे होती है, इसे समझे कि आप कहीं पर अपनी बात को रखना चाहते हो और बात रखने से पहले या बात रखते समय आप को रोक दिया जाए ,तब आपको गुस्सा आ जाता है, क्योंकि आपकी वचन शक्ति को ठेस पहुंची । बच्चे बहुत बार आकर शिकायत करते हैं कि माता-पिता हमारी बात सुनते ही नहीं हैं इसका परिणाम यह आता है कि वह आपसे खुल नहीं पाते और आपसी दूरियां बढ़ जाती है ।फिर वह अपनी बातों को शेयर करने के लिए किसी ने किसी दोस्त की खोज करते हैं ,और उसी के साथ अपनी बात शेयर करते हैं। याद रखें जब परिवार की या संघ समाज की आधी समस्याओं का समाधान तो मात्र सुनने से ही हो जाता है । प्रवचन सभा या किसी मंच पर कोई वक्ता बोलते हुए समय का अतिक्रमण कर ले तो कठोरता पूर्ण शब्दों के साथ उसे नीचे मिटा देना या कोई बालक पहली बार मंच पर जाकर बोलना चाहे तो उसके उत्साह को मंद करने वाले शब्द बोलना, रहने दे तेरे से यह नहीं होगा यह सब वचन बल प्राण हिंसा में आएगा । इसी के साथ एक और हिंसा है काय बल प्राण हिंसा, यानी अपनी काया का दुरुपयोग करना ।जिसके लिए यह काया मिली उसका उस कार्य में उपयोग नहीं करके, गलत कार्य में लगाना ।जैसे कोई बालक बाजार से पेंसिल लेने गया और वह पेंसिल के बदले टोफिया लेकर आए, तो यह पैसों का दुरुपयोग है ।वैसे ही शरीर मिला था त्याग_ तपस्या ,साधना_ आराधना, दान _पुण्य , जप _तप ,ज्ञान और भक्ति करने के लिए मगर इससे यह पवित्र कार्य नहीं करके खाने पीने में , मौज़ शौक, राग रंग संसार के आकर्षण में ही लगाए रखना ।यह इस काया का दुरुपयोग है। आपको भगवान की माला फेरने में मजा ज्यादा आता है या नोट गिनने में ।माला फेरते कहीं चूक गए या कोई काम आ गया है तो लोग माला जहां से छोड़ी थी फिर वहीं से फेरना शुरू कर देते हैं। मगर नोट गिनते चूक गए तो वापस शुरू से गिनती करते हैं । अपनी काया को गलत दिशा में लगाना भी एक प्रकार की हिंसा का ही रूप है अत: वचन और काया की शक्तियों का सदुपयोग करने का प्रयास करें। धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया । धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेडा ने किया ।

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