गलती को गलती माने बिना वीतरागता संभव नहीं= गुरूदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 23-AUG-2023 || अजमेर || गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि मानव जीवन में गलतियों का होना स्वाभाविक है। जब तक व्यक्ति वीतराग अवस्था को प्राप्त नहीं करता है तब तक वह छद्ममस्थ कहलाता है और छद्ममस्थ व्यक्ति से ही गलती होती है ।वीतराग भगवान से नहीं ,लक्ष्य तो हमारा भी वीतराग बनने का है मगर जब तक नहीं बनते तब तक शुद्धिकरण के लिए क्या किया जाए तब भगवान पर फरमाते हैं कि सबसे पहले मन ही मन गलती को स्वीकार करें मन का खेल है कि ,यह सरलता से गलती को स्वीकार नहीं करता है ।यह सदा दूसरों को ही दोषी ठहरता है ।लेकिन जिसमें सरलता होगी और अंतःकरण की शुद्धि की भावना होगी तो बुध्दिबल का उपयोग कर मन ही मन गलती को महसूस करेगा ।फिर वाणी के द्वारा बोलकर अपनी गलती को स्वीकार कर उस गलती के लिए खेद प्रकट करेगा। और माफी मांगने का प्रयास करेगा ।फिर गुरु के पास जाकर उस गलती के दंड स्वरूप कोई ना कोई प्रायश्चित स्वीकार करता है। इस प्रकार मन वचन और काया कि त्रिपदी से युक्त होकर किया गया प्रायश्चित व्यक्ति को शुद्धिकरण की ओर ले जाता है। आज भी क्षमा याचना का पर्व मनाया जाता है और पहले भी क्षमा याचना का पर्व मनाया जाता था ।पहले अंतःकरण की पवित्रता के साथ एक दूसरे के साथ क्षमा याचना की जाती थी ,लेकिन वर्तमान समय में तो यह केवल परंपरा का निर्वाह करना मात्र रह गया है।मगर इसे मात्र परंपरा मान के ही नहीं रहे इसमें शुद्धता के, पवित्रता के भावों को लाने का प्रयास करें। याद रखें क्षमा मांगने से भी ज्यादा कठिन है अपराधी को क्षमा करना ।हमसे गलती हो जाए तो हम क्षमा तो मांग लेते हैं, मगर जब सामने वाला गलती करें और हम उदारता पूर्वक उसे क्षमा कर दें ,यह वीर व्यक्तियों का ही कार्य हो सकता है । कायर व्यक्ति क्षमा नहीं कर सकता। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को 17 बार युद्ध में हराकर भी माफ कर दिया, मगर मोहम्मद गौरी एक बार भी माफी नहीं दे सका। हम अपने जीवन में क्षमा के सच्चे भावों को स्थान देने का प्रयास करें ,तभी हमारा यह जीवन सार्थक हो सकेगा । आज की धर्म सभा में श्रीमती एवं श्रीमान मोहित जी गांधी ने 8 उपवास के एवं श्रीमती सरिता जी चौधरी ने 10 उपवास के प्रत्याखान ग्रहण किया। क्षमायाचना हेतु बाहर से भी श्रद्धालु जन पधारे। धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया। धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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