पाप से मुक्त बनने के लिए हिंसा का त्याग आवश्यक -- गुरूदेव प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 27-JULY-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि पाप से मुक्त बनने का प्रयास करें। इसके लिए हिंसा का त्याग करना आवश्यक है ।शरीर में इंद्रियों की शक्ति को हानि पहुंचाना भी हिंसा है । रसनाइंद्रिय की शक्ति को हानि पहुंचाना रसनाइंद्रिय बल प्राण हिंसा कहलाती है। जीव जब एक भव से दूसरे भव में जाता है, तो भी सबसे पहले आहार ही ग्रहण करता है। आहार करने के आधार पर दो भागों में जिवो का विभाजन किया जाता है जो जीव आहर ग्रहण करते हैं वह आहरक और जो जीव आहार ग्रहण नहीं करते तो अनाहरक कहते हैं। शरीर की भी अपनी क्षमता और स्थितियां होती है, और टिकाए रखने के लिए आहर की आवश्यकता होती है। श्वेतांबर परंपरा तो तीर्थंकर भगवान को भी केवल ज्ञान के पश्चात आहार ग्रहण करने की स्थितियों को स्वीकार करते हैं । शरीर की आहारादि आदि ग्रहण करने की शक्ति रसनाइंद्रिय बल प्राण के आधार पर होती है । रसनाइंद्रिय बल प्राण की हिंसा दो प्रकार से होती है एक द्रव्य हिंसा और दूसरी भाव हिंसा, पहली द्रव्य हिंसा में ऐसा कार्य करना जिससे स्वयं की या दूसरों की रसनाइंद्रिय की शक्ति को बाधा पहुंचती है तो रसना इंद्रिय बल प्राण की द्रव्य हिंसा होती है ।किसी को ऐसी चीज खिला देना जिससे उसकी जिह्वा की शक्ति कमजोर हो जाए, जैसे किसी से बदला लेने के लिए उसे जबरन गरम गरम दूध या चाय पिला देना ,कोई भी खट्टी या कड़वी चीज खिला देना। हमारे यहां नाग श्री ब्राह्मणी का उदाहरण आता है कि उसने अपने घर भिक्षार्थ आए धर्म रूचि अनगार को कड़वे तुंबे की सब्जी जो जहर रूप में परिणित हो गई उसे मुनि के मना करते भी पात्र में डाल दी, और जीव रक्षा की भावना से मुनि ने उसका सेवन किया ,तो उनकी मृत्यु हो गई ।और वह नागश्री ब्राह्मणी अनंत पाप की भागी बन गई। हम अपने जीवन के बारे में विचार करें कि भले ही हम किसी को आहार आदि देकर उनको साता नहीं पहुंचा सके तो कम से कम किसी की रसनाइंद्रिय को हमारे द्वारा हानि पहुंचे, ऐसा कार्य तो नहीं करें ।अगर ऐसा पाप कार्यों से बचने का हमारा प्रयास हो पाया तो यत्र तत्र सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा। धर्म सभा को पूज्य श्री विराग दर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया । धर्म सभा का संचालन बलवीर पीपाड़ा ने किया

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