साधु यदि स्वादु बने तो, गति खराब निश्चित --- प्रियदर्शन मुनि

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 28-JULY-2023 || अजमेर || संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि यह जीवन आत्मा को सजाने के लिए मिला है। मकान को सजाने से पूर्व मकान की सफाई की जाती है उसी प्रकार आत्मा को सजाने के लिए 18 पापों का त्याग आवश्यक है ।अर्थात पहले आत्मा की शुद्धि आवश्यक है ।"शुद्ध के लिए युद्ध "अर्थात आपको अपनी आत्मा की शुद्धता के लिए युद्ध करना है और अपनी आत्मा को रसनाइंद्रिय बलप्राण की हिंसा से बचाना है रसनाइंद्रिय की सहायता से जीव आहार को ग्रहण करता है हमारे यहां आहार ग्रहण करने के 6 कारण बताए गए हैं, उसमें एक कारण है कि शरीर की भूख को शांत करने के लिए आहार किया जाता है ।डॉक्टर भी कहते हैं कि तेज भूख लगने पर ही आहार ग्रहण करना चाहिए। वैज्ञानिकों ने भी प्रयोग करके बताया कि शरीर में आहार का ग्रहण एक बार पर्याप्त होता है। लेकिन हम हमारी दैनिक दिनचर्या को नोट करें कि हमारा आहार कितना और कितनी बार हो रहा है। हमारे आराध्य प्रभु महावीर ने तो साढ़े12 वर्ष की तपस्या काल में मात्र 349 दिन ही आहार ग्रहण किया। भगवान तो आहार भी जब ही ग्रहण करते जब उन्हें लगता कि शरीर को आहार की बहुत ज्यादा जरूरत है। तो जरूरत के हिसाब से ही हम भी आहार ग्रहण करने का प्रयास करें ।आहार ग्रहण करने से पूर्व भी भगवान के नाम का स्मरण करना चाहिए। इसी के साथ आहार के प्रति गृदथा, मूर्च्छा और आसक्ति के भाव को कम करना चाहिए। इससे आत्मा और शरीर दोनों को ही नुकसान होता है ।यह रसनाइंद्रिय बल प्राण का दुरुपयोग है ।कोई साधु आहार के लिए जाए और जहां से अच्छे-अच्छे पदार्थ मिलते हो ऐसे अमीर घरों में ही जाए और जहां सामान्य आहार मिलता हो ऐसे गरीब घर में ना जाए तो यह किस कारण से होगा ?आहार की आसक्ति के कारण से ।लेकिन याद रखें साधु होकर स्वादु बन गए तो गति बिगड़ सकती है जैसे आचार्य मंगू की बिगड़ी थी । आप भी विचार करें कि अगर मैंने भी रसनाइंद्रिय बल प्राण का दुरुपयोग किया तो हो सकता है कि रसनाइंद्रिय की कमजोर शक्ति मिले या फिर रसनाइंद्रिय ही ना मिले । अत रसना इंद्रिय पर जितना नियंत्रण कर सके उतना नियंत्रण करने का प्रयास करें। अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ रहा तो यत्र तत्र सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा। धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया । धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेडा ने किया।

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