भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सेवादल ने किया याद

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 23-JAN-2023 || अजमेर || भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 126वी जयंती के अवसर पर राजस्थान प्रदेश कांग्रेस सेवादल के प्रदेश मुख्य प्रशिक्षक व अजमेर संभाग के प्रभारी शैलेंद्र अग्रवाल के नेतृत्व में सेवादल पदाधिकारियों ने सुभाष बाग में स्थित सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हे पुष्पांजलि अर्पित की तथा संगोष्ठी का आयोजन किया। शैलेंद्र अग्रवाल के साथ आरिफ खान, कमल कृपलानी, पीयूष सुराना, नरेश सोलीवाल, शमशुद्दीन, पार्षद बिट्टू मेहरा व अनिल कश्यप सहित कई सेवादल पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओ ने नेताजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इस अवसर पर शैलेंद्र अग्रवाल ने सुभाष चंद्र बोस की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा की जन जन के नायक महान स्वतन्त्रता सेनानी नेता जी कहते थे कि राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्शों सत्यम, शिवम, सुन्दरम से प्रेरित होना चाहिये | उन्होंने हमें अपने जीवन में सदैव आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी थी चाहे हमारा सफर कितना ही भयानक, कष्टदायी दुखी और बदतर हो। सुभाष चंद्र बोस ने हमें संदेश दिया था कि सफलता, हमेशा असफलता के स्‍तंभ पर खड़ी होती है |जो अपनी ताकत पर भरोसा करते हैं, वो आगे बढ़ते हैं किन्तु उधार की ताकत वाले घायल हो जाते हैं । नेताजी ने बतलाया था कि मेरा अनुभव है कि हमेशा आशा की कोई न कोई किरण आती है, जो हमें जीवन से दूर भटकने नहीं देती । नेताजी बार बार बोलते थे कि अन्याय और अपराध को सहना और गलत के साथ समझौता करना ही सबसे बड़े पाप हैं। भारतीयों का कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं । हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिले, हमारे अन्दर उस आजादी की रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए । एक सैनिक के रूप में आपको हमेशा तीन आदर्शों को संजोना और उन पर जीना होगा ये आदर्श हैं सच्चाई, कर्तव्य और बलिदान । जो सिपाही हमेशा अपने देश के प्रति वफादार रहता है, जो हमेशा अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहता है, वो सिपाही अजेय है । अगर तुम भी अजेय बनना चाहते हो तो इन तीन आदर्शों को अपने ह्रदय में समाहित कर लो |आजादी के आन्दोलन के समय नेताजी बोलते थे कि हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके." "मुझे यह नहीं मालूम की स्वतंत्रता के इस युद्ध में हममें से कौन कौन जीवित बचेंगे ! परन्तु में यह जानता हूँ ,अंत में विजय हमारी ही होगी भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अन्दर से सुसुप्त पड़ी थी .""मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्याओं जैसे गरीबी ,अशिक्षा , बीमारी, कुशल उत्पादन एवं वितरण का समाधान सिर्फ समाजवादी तरीके से ही की जा सकती है जीवन में प्रगति का आशय यह है की शंका संदेह उठते रहें और उनके समाधान के प्रयास का क्रम चलता रहे !""हमारी राह भले ही भयानक और पथरीली हो ,हमारी यात्रा चाहे कितनी भी कष्टदायक हो, फिर भी हमें आगे बढ़ना ही है ! सफलता का दिन दूर हो सकता है ,पर उसका आना अनिवार्य है ! नेताजी कहते थे कि "सुबह से पहले अँधेरी घड़ी अवश्य आती है ! बहादुर बनो और संघर्ष जारी रखो ,क्योंकि स्वतंत्रता निकट है ! " में जीवन की अनिश्च से जरा भी नहीं घबराता !""मुझे जीवनमें एक निश्चित लक्ष्य को पूरा करना है ! मेरा जन्म उसी के लिए हुआ है ! मुझे नेतिक विचारों की धारा में नहीं बहना है ! "भविष्य अब भी मेरे हाथ में है !" मेरे जीवन के अनुभवों में एक यह भी है ! मुझे आशा है की कोई-न-कोई किरण उबार लेती है और जीवन से दूर भटकने नहीं देती !" हमें केवल कार्य करने का अधिकार है ! कर्म ही हमारा कर्तव्य है ! कर्म के फल का स्वामी वह (भगवान ) है, हम नहीं!""जिस व्यक्ति में सनक नहीं होती ,वह कभी भी महान नहीं बन सकता ! परन्तु सभी पागल व्यक्ति महान नहीं बन जाते ! क्योंकि सभी पागल व्यक्ति प्रभावशाली नहीं होते ! आखिर क्यों ? कारण यह है की केवल पागलपन ही काफी नहीं है ! इसके अतिरिक्त कुछ और भी आवश्यक है !"याद रखें अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपराध है एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है । नेताजी अक्सर कहते थे कि सफलता हमसे दूर जरुर हो सकती है किन्तु वह दिन अधिक दूर नहीं जब हम भी सफल होंगे । याद रखिये कि जीवन में सफलता का आना अनिवार्य ही है । नेताजी के मुताबिक मां का प्यार सबसे गहरा और स्वार्थ रहित होता है ।माँ के प्यार को मापने का कोई पैमाना हो नहीं सकता है मां की ममता और प्यार को किसी भी तरह से मापा नहीं जा सकता । नेताजी ने हमको समझाया कि हमारे देश की प्रमुख समस्याएं गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, कुशल उत्पादन एवं वितरण सिर्फ समाजवादी तरीके से ही दूर की जा सकती है। आजाद हिन्द फौज के प्रणेता क्रांतिकारी जन नायक सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक के निवासी जानकीनाथ बोस प्रभावती के यहाँ हुआ था | सुभाष चंद्र 14 लड़के लड़कियों में से नौवीं संतान थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कटक में रेवेनशा कॉलेजिएट स्कूल में हुई । उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से 1919 में बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की थी इस परीक्षा में उन्हें यूनिवर्सिटी में उन्हें दूसरा स्थान मिला था। 1920 की आईसीएस परीक्षा में उन्हें चौथा स्थान मिला। सुभाष का मन अंग्रेजों के अधीन काम करने का नहीं था इसलिए उन्होंने ICS से एक साल के भीतर 22 अप्रैल 1921 को त्यागपत्र दे दिया क्योंकि उनके दिल में अंग्रेजों की गुलामी से भारत माता को आजाद करने का जुनून था । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की सलाह के अनुसार भारत वापस आने पर वे सर्वप्रथम बंबई गये और गांधीजी से मिले। वहाँ 20 जुलाई 1921 को गांधी जी और सुभाष के बीच पहली मुलाकात हुई। बहुत जल्द ही सुभाष देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गये। नेहरूजी के साथ सुभाष ने कांग्रेस के अंतर्गत युवाओं की इण्डिपेंडेंस लीग शुरू की। 1928 में जब साइमनकमीशन भारत आया तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाये। कोलकाता में सुभाष ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिये कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष बनाये गये सुभाष बाबू को इस आयोग का सदस्य बनाया गया। 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ तब इस अधिवेशन के अन्दर तय किया गया कि भारत में 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जायेगा। अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास का दण्ड मिला । सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 में छह महीने के लिये क्रष्ण मन्दिर जाना पड़ा । 1930 में सुभाष कारावास में ही थे कि चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुना गया। इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गयी। वे जब कलकत्ता महापालिका के प्रमुख अधिकारी बने तो उन्होंने कलकत्ता के रास्तों का अंग्रेजी नाम हटाकर भारतीय नाम पर कर दिया ।1934 ई. में सुभाष अपना इलाज कराने के लिए ऑस्ट्रिया गए थे। उस समय उन्हें अपनी पुस्तक टाइप करने के लिए एक टाइपिस्ट की जरूरत थी । उन्हें एमिली शेंकल नाम की एक टाइपिस्ट महिला मिली | उन्होंने उससे सन् 1942 में बाढ़ गस्टिन नामक स्थान पर हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार एमिली शेंकल से विवाह किया। एमिली शेंकल से उनको पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम अनीता रखा | सुभाष ने उसे पहली बार तब देखा जब वह मुश्किल से चार सप्ताह की थी। 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुना गया । इस अधिवेशन में सुभाष का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। । 3 मई 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लाक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। बंगाल की भयंकरबाढ़ में घिरे लोगों को उन्होंने भोजन, वस्त्र और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का साहसपूर्ण काम किया था | समाज सेवा का काम नियमित रूप से चलता रहे इसके लिए उन्होंने 'युवक-दल' की स्थापना की । द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। उन्होंने भारतवासियों को "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे दूंगा" का नारा दिया था जो आज भी हमारे मन मस्तिष्क में गूंज रहा है |

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