क्या यह जातिगत और शैक्षणिक आरक्षण के अंत की शुरुआत है? -- डॉ. अजय कुमार मिश्रा

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 13-NOV-2022 लम्बे समय से चल रही मांग को ध्यान में रखतें हुए और वास्तविक जरूरत के मद्देनजर वर्ष 2019 में मोदी सरकार ने नियमों में बदलाव करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की शुरुआत किया | जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों को 10 प्रतिशत सरकारी नौकरियों, पढ़ाई इत्यादि में आरक्षण प्राप्त होने लगा है | यह ठीक उसी तरह से लागू है जिस तरह से एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय को आरक्षण का लाभ मिल रहा है | सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिए जा रहे आरक्षण पर हमेशा ही तीखा प्रहार होता रहा और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया | कई बार सुनवाई के पश्चात् सरकार द्वारा दिये जा रहे 10% आर्थिक आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सहमती दे दिया है | पांच जजों की बेंच में सरकार के पक्ष में 3:2 के बहुमत से अपना फैसला सुनाया है | अब आर्थिक आधार पर प्राप्त आरक्षण की वैद्यता को स्वीकार माना जा सकता है | इसके पूर्व देश में सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर ही आरक्षण मौजूद था | पहले से देश में चल रहे आरक्षण की 50 फीसदी की लिमिट बढ़ कर अब 60 फीसदी हो गयी है | जबकि पहले यह सामान्य अवधारणा रही थी की 50 फीसदी की सीमा को बढाया नहीं जा सकता है | हालाँकि देश के राज्यों में आरक्षण की सीमा और प्रतिशत में आपको व्यापक अंतर भी देखने को मिलेगा | देश की सर्वोच्च अदालत ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को मान्यता देने के साथ ही यह टिप्पणी भी किया है कि संविधान बनाने वालों ने आरक्षण देने की समय सीमा 10 वर्ष सुनिश्चित किया था पर आजादी के 75 वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् भी यह जारी है | सही मायने में उसका मकसद भी पूरा नहीं हो पाया है | कोर्ट का कहना था की 75 वर्ष बाद आरक्षण पर समाज के हित में विचार करने की ज़रूरत है | अदालत ने कहा कि आरक्षण समय के साथ ख़त्म होता जाएगा | एग्लो इंडियन के लिए संसद में जो रिजर्वेशन था, वह ख़त्म हो गया है | अदालत ने यह भी टिप्पणी किया है कि यह सब हमेशा के लिए नहीं हो सकता | अदालत की इस टिप्पणी के पश्चात् एक बड़ा प्रश्न स्वतः सामने आया है जिसकी चर्चा जोरों पर है की “क्या यह जातिगत और शैक्षणिक आरक्षण के अंत की शुरुआत है? कई बड़े विशेषज्ञों का मानना है की कोर्ट के इस फैसले को गंभीरता से देखा जाय तो आर्थिक आधार पर आरक्षण पर सरकार का पहला कदम है देश मंच परम्परागत आरक्षण की समाप्त करके आरक्षण को नए रूप में लाने का | हालाँकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी अपने कई भाषणों में यह कह चूंके है की उनके जीते जी आरक्षण को समाप्त नहीं होने देगे | देश की राजनैतिक और चुनावी समीकरण को देखा जाए तो इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता की जातिगत आधार पर आरक्षण ख़त्म होने की राह पर बढ़ रहा है | जहाँ एक तरफ आरक्षण को समाप्त करने के लिए अनेकों पेचीदगियां है वही दूसरी तरफ यह निर्भर करता है सरकार के नीति नियम और दूरदर्शिता इस विषय पर क्या होगी | सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के पश्चात् सरकार को जरुर इस विषय में नए सिरे से सोचने को बल मिला होगा | इंदिरा साहनी के मामले में यह निर्णय हुआ था की देश में आरक्षण की सीमा अधिकतम 50 फीसदी रहेगी अब कोर्ट के नवीनतम आदेश के बाद यह सीमा बढ़ कर 60 के करीब हो गयी है | सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन के लिए 50 फ़ीसदी लिमिट के तर्क को भी नकार दिया और कहा कि यह विधि लचीला है और संसद इस पर फैसला ले सकती है | सरकार के आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण का विरोध करने वालों का तर्क है की संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में जो प्रावधान है, उसके तहत सिर्फ जातिगत और शैक्षणिक तौर पर पिछड़ों के आरक्षण की बात कही गयी है | सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर जोड़ा गया आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ है | इस दिए गए इस तर्क पर कोर्ट सहमत नहीं हुआ और सरकार द्वारा उठाये गए कदम को सही बताया और कहा की यह कही से भी संविधान की मूल भावना का उलंघन नहीं है | शीर्ष अदालत ने बहुमत से कहा कि जो लोग समाज में आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए हैं, उन्हें समान अवसर प्रदान करना ज़रूरी है। इसके लिए सरकार के किसी भी प्रयास को सकारात्मक तरीके से देखा जाना चाहिए | आरक्षण की मूल भावना में समय-समय पर कई बदलाव तर्कों के आधार पर किये गए है संविधान की मूल भावना के तहत एससी-एसटी को आरक्षण देने की बात थी जो पहले 10 वर्ष के लिए थी वर्ष 1992 में ओबीसी वर्ग को भी अलग से आरक्षण दिया जाने लगा | अब सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण दे देने से सामान्य वर्ग के लोगों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगा है यानि की देश में अब सामाजिक और शैक्षणिक पैमाने के अलावा आरक्षण का मूल्यांकन आर्थिक आधार पर भी मान्य हो गया है | विगत तीन दशकों से अधिक समय में न केवल देश में आर्थिक प्रगति तेजी से हुई है बल्कि वैश्वीकरण की व्यवस्था में देश के कोने कोने के लोगों को प्रभावित किया है | देश की बढ़ती आबादी और तकनीकी का नवीनतम उपयोग अब सरकार द्वारा दिए जा रहे रोजगार पर भी व्यापक असर डालना शुरू कर दिया है | सरकारी उपेक्षाओं और निजीकरण की राह ने सरकारी क्षेत्रो में रोजगार के अवसर को लगभग न के बराबर कर दिया है | ठेका प्रणाली के आ जाने से सरकारी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में भारी कमी को भी प्रदर्शित किया है | रही बात शैक्षणिक आरक्षण की तो यह बात किसी से छिपी नहीं है की जिस पैटर्न पर आज परीक्षाएं आयोजित की जा रही है उसमे सरकारी स्कूल और कालेजों से पढ़ कर आने वाले बच्चों के लिए सीमित अवसर ही उपलब्ध है | ऐसे में जो लोग आरक्षण का ख्याब इसलिए देख रहें है की उन्हें इसके जरिये बड़ा अवसर मिल जायेगा एक कोरी कल्पना मात्र ही कहा जा सकता है | अब देश की व्यवस्था के अनुरूप सभी तबकों के लोगों को न केवल ज्ञान अर्जित करना पड़ेगा बल्कि हर समय हर क्षण मानकों पर खरा भी उतरना पड़ेगा और यह आरक्षण के जरिये संभवतः प्रतिपूर्ति नहीं कर सकता है | शायद इसी लिए देश की सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी किया है की आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा | देश की संरचना और सभी के हितों को सुरक्षित करने के लिए समय समय पर लागू किये गए आधुनिक नियम सभी के हितों की मजबूती से रक्षा कर रहें है | ऐसे में बाजार के अनुरूप शिक्षा और रोजगार प्राप्त करने के लिए जिसकी आवश्यकता है उसी के लिए सभी को तटस्थ होना पड़ेगा | आज देश की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था निजी क्षेत्र पर पूर्ण रूप से आश्रित हो चुकी है ऐसे में सभी को आरक्षण की सीमित विचार धारा से बाहर आकर के पुनः नए सिरे से सोचने की जरूरत है | इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है की वर्तमान परिवेश में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण पर की गयी टिप्पणी सिर्फ आज की नहीं बल्कि भविष्य के भारत की कल्पना का भी एक मूर्त रूप देने की प्रतिबद्धता है |
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