नसीराबाद का महत्व इतिहास के पन्नो में, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नसीराबाद में भी की गई थी क्रांति

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 13-AUG-2022 || नसीराबाद || यह तो सर्वविदित है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नसीराबाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा क्रांति का बिगुल यहीं से बजा परंतु प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भी नसीराबाद की भूमिका महत्वपूर्ण रही तथा यहां भी क्रांतिकारियों ने कई कार्य किए हालांकि क्रांतिकारी सफल नहीं हो पाए परंतु यहां के क्रांतिकारियों ने नसीराबाद का नाम इतिहास में अमर कर दिया । नसीराबाद के इतिहास अध्यक्ष विष्णु जिंदल ने बताया की नसीराबाद छावनी से 28 मई 1857 में ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों के दस्ते ने विद्रोह का बिगुल बजाया था फिर किसी क्रांति की धरा से प्रथम विश्वयुद्ध 1914 में क्रांतिकारियों ने पुनः सैनिक विप्लव की योजना बनाई थी । जिंदल ने बताया कि बिजोलिया किसान आंदोलन के प्रणेता महान स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक को नसीराबाद पर कब्जा करने का भार सौंपा गया था पथिक का परिवार भी क्रांति के लिए ही समर्पित रहा उनके दादा इंदर सिंह भी 1857 की क्रांति में मालगढ़ के नवाब की सेना का नेतृत्व करते हुए शहीद हुए थे । पथिक के दादा इंदर सिंह के बलिदान के बाद उनके पिता हमीर सिंह ने भूमिगत रहते हुए जीवन बिताया तथा पथिक के चाचा भी क्रांतिकारी विचारों के ही थे विजय सिंह पथिक उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली अख्तियारपुर ग्राम में जन्मे थे पर महान देशभक्त क्रांतिकारी रासबिहारी बोस के संपर्क में आने से उनका क्रांतिकारी जीवन शुरू हुआ यद्यपि उनका नाम भूपसिंह था । प्रथम विश्व युद्ध के समय 1914 में दिसंबर माह में क्रांतिकारियों ने देश से अंग्रेजों को बाहर निकालने में सैनिक विप्लव की योजना बनाई थी जिसके अंतर्गत 19 फरवरी 1915 को क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक को नसीराबाद पर कब्जा करने का भार सौंपा गया था किंतु क्रांति की तारीख का अंग्रेजों को पता चल गया इस कारण क्रांति और सफल हो गई । राजस्थान में क्रांति और सफल हो जाने पर उन्हें खरवा ठाकुर गोपाल सिंह के साथ टाट गढ़ किले में नजरबंद कर दिया गया पुलिस की नजरों से बचने के लिए उन्होंने अपना नाम विजय सिंह पथिक रख लिया । विजय सिंह पथिक कम पढ़े लिखे जरूर थे पर साहसिक क्रांतिकारी के साथ-साथ कुशल साहित्यकार और पत्रकार भी थे हालांकि आजादी के बाद वह 7 वर्ष तक ही जीवित रहे परंतु इस दौरान उन्होंने घोर आर्थिक कष्ट और अपनों की उपेक्षा झेली । राजस्थान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले नसीराबाद में क्रांतिकारियों के नायक महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन 28 मई 1954 को ही हुआ तथा इनका निधन अजमेर में ही हुआ था । ऐसे सच्चे सपूतों और देश के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले क्रांतिकारियों के लिए कवि न लिखा है : "प्रेरणा शहीदों से नहीं लेंगे तो, आजादी ढलती हुई सांझ हो जाएगी, वीरों की पूजा नहीं करेंगे तो, सच मानो वीरता बांझ हो जाएगी"

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