नसीराबाद का वीर योद्धा जिससे स्थानीय लोग आज भी बेखबर

||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 13-AUG-2022 || नसीराबाद || .राजस्थान (तब राजपुताना) में आजादी की लड़ाई में पहल करने वाली नसीराबाद छावनी ही थी जहां 28 मई 1857 गुरुवार को दोपहर 2:20 पर ब्रिटिश सेना के भारतीय दस्ते के सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया था । स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में नसीराबाद की विशेष भूमिका रही है और नसीराबाद का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे राष्ट्र नायक की आजाद हिंद फौज के साथ भी जुड़ा हुआ है । नसीराबाद इतिहास के जानकार एवं लेखक विष्णु जिंदल ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के समय नसीराबाद के एक वीर सपूत ने नसीराबाद का नाम अमर कर दिया लेकिन नसीराबाद की जनता आज भी उस वीर की पहचान से अनजान है । जिंदल ने बताया कि नसीराबाद का एक वीर सपूत जो ब्रिटिश सेना में हवलदार के पद पर था देश की आजादी के लिए ब्रिटिश सेना की नौकरी छोड़ नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गया और वीरता में नसीराबाद का नाम कर दिया परंतु यह एक विडंबना ही है कि इस वीर सपूत के बारे में स्थानीय समाज के जानकार लोग भी नहीं बचे जिसके कारण समाज में यह घटना गुमनामी की तरह ही है । जिंदल ने बताया कि यह वीर सपूत लगभग एक शताब्दी पूर्व नसीराबाद के कहार मोहल्ले में जन्मा गोविंद कहार था इनके पिता का नाम ग्यारसीलाल था । वे गरीबी और अभाव में पले थे उनको अभाव तो परेशान करते ही थे परंतु फिर भी वे कमजोर नहीं थे वे बहुत निर्भीक और बेबाक थे और उनका दृढ़ निश्चय उन्हें हर अन्याय से लड़ने की प्रेरणा देता था । उन्होंने स्वयं साधन जुटाकर पढ़ाई की और बाद में उनका विवाह गंगा देवी से हुआ । वे देश के लिए कुछ अनूठा करना चाहते थे इसी उद्देश्य से भी जोधपुर महाराजा की सेना में भी भर्ती हो गए इससे पूर्व उन्होंने ब्रिटिश सेना में हवलदार पद तक कार्य किया द्वितीय विश्व युद्ध (1943-1945) में भाग लेकर वीरता की धाक भी जमाई । आकर्षक व्यक्तित्व के स्वाभिमानी गोविंद कहार ने जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आव्हान "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का शंखनाद सुना तो वह अपने आप को रोक नहीं सके और नारे से प्रभावित होकर भारत माता की आजादी के लिए सेना छोड़ आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए वहां अंग्रेजों से लड़ाई में वीरोचित यश कमाया । उनका काफी समय सिंगापुर में बीता तथा देश के आजाद होने पर भी पुनः भारत लौटे । कहार समाज के जागरूक युवा समाजसेवी स्वर्गीय भगत सिंह मेहरा भी काफी प्रयासों के बावजूद विशेष जानकारी हासिल नहीं कर पाए । करीब 25 वर्ष पूर्व उन्होंने इस लेखक को बताया था कि गोविंद कहार कुछ समय भारतीय सेना में रहकर सेवानिवृत्त हुए और उनका देहांत 70 वर्ष की आयु में हुआ । उनके पुत्र का नाम शारदा कुमार था जिसने भारतीय नौसेना में नौकरी की थी । इस परिवार के बारे में नसीराबाद नगर आज भी अनजान है ।

Comments

Popular posts from this blog

गुलाम दस्तगीर कुरैशी की पुत्री मनतशा कुरैशी ने 10 वीं बोर्ड में 92.8 प्रतिशत अंक प्राप्त कर किया नाम रोशन

अजमेर उत्तर के दो ब्लॉकों की जम्बो कार्यकारिणी घोषित

विवादों के चलते हों रही अनमोल धरोहर खुर्द बुर्द व रिश्ते तार तार