साहित्यकार प्रदीप गुप्ता की पितृ दिवस के अवसर पर रचित कविता ""पिता""

 


||PAYAM E RAJASTHAN NEWS|| 17-JUNE-2020
|| अजमेर ||  साहित्यकार प्रदीप गुप्ता की पितृ दिवस के अवसर पर रचित कविता ""पिता""                                                                      पिता


जब वो पिता बना 
तो बस एक पिता 
बन कर  ही रह गया
उसकी अपनी खुद की पहचान, एक पिता होने में ही
कहीं खो सी गई
अब वो सिर्फ  एक पिता है
अब वो अपने लिये
कुछ नही सोचता
बच्चों के कपड़े और खिलोने
पालने और झूलों
के चक्कर में
उसे अपनी जरूरतें
अब नजर नही आती
बच्चे अब कुछ और 
बड़े हो गए हैं
अच्छे स्कूल में एडमिशन का संघर्ष
और अपनी सामर्थ्य में
सामंजस्य बैठाता
अपनी जरूरतों को 
कुछ और सीमित करता
वो अब भी  एक पिता है
स्कूल की फीस बस का किराया, यूनिफॉर्म
और कॉपी किताबें
उसे पिता के अलावा
कुछ और बनने नहीं देती
बच्चे कुछ और बडे हो चले हैं
बच्चों की महंगी कोचिंग
उनके भविष्य की
अनिश्चितता एवं आशंकाओं
से चिंतित होता
उनकी सफलता के लिये 
मंदिर मंदिर प्रसाद बोलता 
वो पिता बनता चला जाता है
अपने स्वास्थ्य और दवाईयों
को नजरअंदाज करता
अपने बच्चों की खुशियों में
अपनी खुशियां तलाशता
और अपनी तमाम 
तकलीफ़ों को छुपाता
वो पिता बनने की
कोशिश ही तो करता रहता है
फिर बच्चों की नौकरी
और शादी के लिए भागदौड़
और उनके बड़े हो जाने का अहसास
उसे छोटा बना देता है
मगर वो अब भी
पिता बना रहना चाहता है
वो अब बूढ़ा हो चुका है
अब बच्चे दूर रहते हैं
उनका अब अपना
एक अलग परिवार है
पिता के कान अब
फ़ोन की घंटी सुनने को
तरसते हैं
और आँखे बच्चों को
देखने के लिए
किसी त्यौहार का
इंतेज़ार करती हैं
बच्चे अब बच्चे नहीं रहे
पर वो  अब भी एक पिता है।


प्रदीप गुप्ता 
अजमेर ।   


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